उगते सूरज को शीश नवाते हैंजिससे कुछ मिल जाए, उसकी गाते हैं. जो अस्त होता है उसे चिढ़ाते है.सत्य क्या और नैतिकता क्या,जो सत्तासीन है उसकी सब गातें हैंयह अब सर्वमान्य नियम है,काम हो तो सब भातें हैं. समाज कि क्या यही नियति है?कि जिसके दिन हैं उसकी रातें हैं?!ध्यान दें, यहाँ सब चलता है,शेष तो कहने सुनने कि बातें हैं.by
Amit
JNU, New Delhi
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