एक बार फिर से मैं उसी सड़क पर हूँ..
जिसके सफ़र का कोई छोर नहीं!
बस चौराहे ही हैं, राहगीर कोई और नहीं.
ठिठकता हूँ हर बार कि मंजिल पास है शायद
मील के पत्थर का कोई जोर नहीं.
हर बार कि तरह इस बार भी,
मुझे पता नहीं किधर जाना है
कोई सराय नहीं... कोई ठौर नहीं.by
Amit
JNU, New Delhi
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